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*‘इमोजी’…मतलब भावना ने भाषा की छुट्टी कर दी..!!*

admin July 17, 2026 1 min read
संजीव शर्मा
हाल ही में विश्व इमोजी दिवस है। यानी उन पीले-पीले गोल चेहरों का दिन, जिन्होंने दुनिया की हजारों भाषाओं को चुनौती दे दी है। कभी शब्दों के सहारे रिश्ते बनते थे, अब एक 😊😍😡 या 👍 तय कर देता है कि सामने वाला खुश है, नाराज़ है या केवल औपचारिकता निभा रहा है।
किसी समय हम सभी चिट्ठी में लिखते थे  कि “प्रिय मित्र, तुम्हारा पत्र पाकर हृदय गदगद हो उठा।” आज इस भाव को एक ❤️ में समेट दिया गया है। कभी किसी की उपलब्धि पर हम खुलकर लिखते थे कि “हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ।” अब बस… 🎉👏और काम खत्म।
अब तो ऐसा लगने लगा है कि भाषा पुस्तकों/शब्दकोश/अखबारों में कैद हो गई है और बातचीत इमोजी कीबोर्ड पर आ बसी है। सोशल मीडिया में तो बिना इमोजी के गुजारा ही नहीं है। सारा सुख-दुख बस चंद कार्टून नुमा चेहरों में सिमट गया है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इमोजी ने उम्र का, अनुभव का,रिश्तों का अंतर भी लगभग मिटा दिया है। दस बारह साल का बच्चा भी 😂 भेजता है और सत्तर पचहत्तर वर्ष के दादाजी भी। दोनों का हँसना अब एक ही चेहरे से व्यक्त होता है। दुख भी एक 😢 है, गुस्सा भी 😡 और प्यार भी ❤️। भावनाओं की विविधता चंद चित्रों में सिमटती जा रही है।
इस बदलाव का एक दूसरा पहलू भी है। पहले किसी की बात पसंद आती थी तो हम लिखते थे कि “आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ।”असहमति होती तो तर्क दिए जाते थे..विषय पर चर्चा/बहस और तर्क वितर्क होते थे। अब पूरी बहस का निष्कर्ष केवल दो बटन हैं 👍 या ❤️
कई बार तो समझ ही नहीं आता कि सामने वाले ने पोस्ट पढ़ी भी है या केवल अंगूठा दिखाकर आगे बढ़ गया। कुल मिलाकर संवाद की जगह प्रतिक्रिया ने ले ली है, और प्रतिक्रिया भी इतनी छोटी कि उसमें विचारों की कोई जगह नहीं बचती।
 बाकी कई बार तो रिएक्शन (प्रतिक्रिया) का स्थान भी व्यूज (views) ले जाते हैं और लिखने/पोस्ट करने वाले की पूरी मेहनत व्यूज की संख्या में सिमट जाती है। अब तो सोशल मीडिया में लोकप्रियता आंकने का पैरामीटर व्यूज ही रह गया है और व्यूज के आधार पर कमाई ने तो सारे मनोभाव/क्रिया प्रतिक्रिया को व्यूज में समेट दिया है।
इमोजी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह हर व्यक्ति के लिए अलग अर्थ भी रख सकता है। किसी के लिए 🙂 शिष्ट मुस्कान है, तो किसी के लिए व्यंग्य।
 😂 किसी के लिए ठहाका है, तो किसी के लिए मज़ाक उड़ाना। यानी भाषा, जो स्पष्टता लाती थी, उसकी जगह कई बार अनुमान ने ले ली है। वैसे भी, आमतौर पर कुछ नियमित इस्तेमाल होने वाले इमोजी को छोड़कर अधिकतर लोगों को इन इमोजी के सही अर्थ भी नहीं पता होते। इसलिए, वे बिना अर्थ जाने भाव का अनर्थ करते रहते हैं।
इमोजी ने सबसे गहरा असर बच्चों की शब्द-सम्पदा पर डाला है। अब जब हर भावना के लिए उनके पास चित्र मौजूद हैं तो उन्हें नए शब्द सीखने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती है।आश्चर्यचकित/ विस्मित/आह्लादित/व्यथित/आक्रोशित जैसे सुंदर एवं अर्थपूर्ण शब्द धीरे-धीरे चंद चेहरे के पीछे छिपते जा रहे हैं।
हम सभी जानते हैं भाषा में हर शब्द का उपयोग के मुताबिक अर्थ होता है, उनमें अर्थ के साथ गूढ़ अर्थ भी छिपा होता है जिसे अंग्रेजी में बिटवीन द लाइन कहते हैं लेकिन इमोजी की बस एक भाषा/अर्थ होता है। विकास का एक पहलू यह भी है कि भाषा जितनी समृद्ध होती है, सोच भी उतनी ही गहरी होती है। शब्द घटते हैं तो विचार भी घटने लगते हैं।
लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि इमोजी बुरे हैं और उनको व्यवहार से निकाल फेंकना चाहिए। इमोजी उपयोगी हैं और कई बार संवाद को सहज, तेज़ और कई बार अधिक आत्मीय बनाते हैं। इसलिए समस्या उनका इस्तेमाल नहीं बल्कि उन्हें भाषा की तरह उपयोग करना है क्योंकि वे भाषा के सहायक बन सकते हैं लेकिन भाषा के विकल्प नहीं बन सकते और इसे किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।
इसलिए, इस तरह के स्वघोषित दिवसों पर हमें अपने आप से एक सवाल जरूर करना चाहिए कि क्या हम या हमारे बाद की पीढ़ियों में भाषा का स्थान इमोजी को सहजता से सौंपना उचित है और इससे भाषा का भविष्य कहां पहुंचेगा?
एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि जिस दिन हमारी पूरी बातचीत केवल 😊😂❤️👍 तक सीमित रह जाएगी, उस दिन शब्द भी मौन हो जाएँगे क्योंकि इमोजी चेहरे दिखाते हैं, लेकिन शब्द मन की पूरी तस्वीर बनाते हैं।

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