‘ताजमहल का टेंडर’ के मंचन के साथ ‘हिम रंग षष्ठी’ के कुल्लू संस्करण का समापन

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल द्वारा कुल्लू में आयोजित तीन दिवसीय ग्रीष्मकालीन नाट्योत्सव ‘हिम रंग षष्ठी’ के कुल्लू संस्करण का समापन आज अटल सदन स्थित अंतरंग सभागार में रंगमंडल के बहुचर्चित एवं पिछले लगभग 28 वर्षों से निरंतर लोकप्रिय रहे नाटक ‘ताजमहल का टेंडर’ के प्रभावशाली मंचन के साथ हुआ।
इस अवसर पर रंगकर्म के क्षेत्र में प्रदेश के पहले हिमाचल गौरव सम्मान प्राप्त वरिष्ठ रंगकर्मी केहर सिंह ठाकुर मुख्यतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
इस नाटक की रचना अवकाश प्राप्त सिविल सेवा अधिकारी अजय शुक्ल ने की है, जबकि इसकी संगीत परिकल्पना एवं मूल निर्देशन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी द्वारा किया गया है। उल्लेखनीय है कि लगभग 28 वर्ष पूर्व इस नाटक के प्रथम मंचन के समय चित्तरंजन त्रिपाठी स्वयं रंगमंडल के कलाकार थे और आज राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।
कुल्लू में हुए इस मंचन का एक विशेष आकर्षण यह भी रहा कि कुल्लू निवासी राजेश शर्मा ने नाटक के लोकप्रिय पात्र ‘भैयाजी’ की भूमिका निभाई। गौरतलब है कि लगभग 28 वर्ष पूर्व जब इस नाटक का पहला मंचन हुआ था, तब भी राजेश शर्मा ने यही भूमिका निभाई थी। इतने लंबे अंतराल के बाद उसी पात्र को पुनः मंच पर जीवंत करना दर्शकों के लिए एक भावनात्मक और स्मरणीय अनुभव रहा।
नाटक ‘ताजमहल का टेंडर’ एक उत्कृष्ट व्यंग्य-रचना है, जिसकी मूल कल्पना अत्यंत रोचक है। नाटक यह प्रश्न उठाता है कि यदि मुगल सम्राट शाहजहाँ आज के दौर में ताजमहल जैसा स्मारक बनवाने का निर्णय लें और उन्हें सरकारी विभागों, कार्यालयों तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़े, तो उन्हें किन-किन जटिल, हास्यास्पद और विडंबनापूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा।
लेखक ने इस सरल प्रतीत होने वाली कल्पना को तीखे व्यंग्य, हास्य और सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणियों से समृद्ध किया है। नाटक केवल फाइलों के अंबार, विभागीय कार्यशैली और प्रशासनिक टालमटोल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह भी उजागर करता है कि किस प्रकार राजनीतिक हित, सामाजिक दबाव और विभिन्न बाहरी शक्तियाँ किसी महत्त्वाकांक्षी परियोजना को प्रभावित करती हैं। ताजमहल जैसे स्मारक का निर्माण किस प्रकार विभिन्न हितों और बहसों के बीच उलझ सकता है, यह नाटक अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।
देश और विदेश में अनेक बार मंचित हो चुके इस नाटक की लोकप्रियता आज भी बरकरार है। समय-समय पर समकालीन संदर्भों और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप कुछ नए संवाद जोड़कर इसे और अधिक प्रासंगिक बनाया जाता रहा है। यही कारण है कि दशकों पुरानी यह प्रस्तुति आज भी दर्शकों से गहरा सहसंबंध स्थापित करती है और उतनी ही प्रभावशाली प्रतीत होती है जितनी अपने प्रारम्भिक मंचन के समय थी।
हास्य और व्यंग्य के माध्यम से व्यवस्था की विसंगतियों पर तीखी टिप्पणी करने वाला यह नाटक आज भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है और दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ गंभीर चिंतन के लिए भी प्रेरित करता है।
‘हिम रंग षष्ठी’ के कुल्लू संस्करण के सफल समापन के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल का अगला पड़ाव धर्मशाला होगा, जहाँ रंगमंडल अपनी नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से दर्शकों से संवाद स्थापित करेगा।
इस अवसर पर बिहारी लाल शर्मा उप निदेशक निष्पादन एवं ललित कला,अनिल हारटा सहायक निदेशक निष्पादन एवं ललित कला, जिला भाषा अधिकारी प्रोमिला गुलेरिया, राजेश सिंह रंगमण्डल प्रमुख, अभिषेक मोदगिल स्टेजमास्टर, डॉ उरसेम लता प्राचार्य राजकीय महाविद्यालय पनारसा, डॉ शेफाली प्राचार्य राजकीय महाविद्यालय हरिपुर, दिनेश सेन अध्यक्ष सूत्रधार, निरंजन देव शर्मा सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
